अंतरात्मा के आवाज

का जमाना आ गयो भाया, कुरसी के लड़ाई मे साँच के बलि दिया गइल। सत्यमेव जयते लिखलका पत्थरवा लागत बा कवनो बाढ़ मे दहा गइल। तबे नु एकर परिभाषा घरी घरी बदल रहल बा। पहिले दिन कुछ आउर आ दोसरा दिन कुछ आउर। अपना देश मे एकर बरियार सुविधा बा जवन कबों केकरो आवाज के अंतरात्मा के आवाज मे पलट देवेले। बाकि एह आवाज के निकाले खाति ढेर पापड़ बेले के पड़ेला। पापड़ बेल देले भर से कबों काम ना चले, त ओह पर कुछ छिड़के के पड़ेला,घाम देखावे के पड़ेला, आ कबों कबों आँचो देखावे के परि जाला। बाकि अबरी दाल भात मे मुसरचंद आ गइले, एही से अंतरात्मा के आवाज ना निकल पावल, नरेटी मे अंटकि गइल। कब निकली एकर कवनों पता नइखे, भा अंटकले रहि जाई, इहो कहल ना जा सकेला। केरा आ बइर के संगत कब ले चल पाई, ई त समय बताई। बाढ़ मे दहा जाये के डरे कीरा आ नेउर एकही डाढ़ पर लउके लन बाकि असर घटते एक दोसरा के जिनगी का पाछे परि जालें। अबही त हँसी हँसी के मुसकियाए आ सेल्फियाए के समय ह, सभे एकर भरपूर लाभ उठा रहल ह। ढेर लोग त जलसा मना रहल बा।

जोगाड़ तंत्र के जमाने मे इहो ना बुझाला कि के जीतल भा के हारल। कुछ लोग एहमे जीतियों के हार जाला आ कुछ लोग हारियों के जीत जाला। अइसने मे लंगूर के हाथे हूर पड़िए जाला। कबों कबों ओकरो भाग जाग जाला जेकर “न गाँव मे घर बा आ ना सिवाने खेत”। भलही उ कठपुतरी लेखा ता थाइया ता थाइया पर ठुमका लगावत लगावत समय काट लेत होखे। बेचारी जनता बेच्चारी बनि के तमासा देखत रहि जाले। ओकरे हाथे त उहे आवेला, अरे मालूम नइखे का “बाबाजी का ठुल्लु”। एह बेचारी जनता के अंतरात्मा के आवाजो केकरो ना सुनाला, भा केहू सुनलो ना पसन करेला। एगो मंथरा के चाल से 3 गो राजा लोग दुखी भइल, दू लोग त दुनिया छोड़ गइल, जवने कालखंड मे तीन-तीन मंथरा एकही जगह एकही समय पर जुट जाँय, फेर त तूफान के अंदाजा लगावल जा सकेला। लइकई मे सुनले रहनी सन कि जहवाँ दू गो मेहरारू भा लइकी मुड़ी सटा के बतीसी फार मुसुकी मारत होखें, उहाँ अनहोनी होखे से दइयो ना बचा सकेले, मनई के का औकात।

पुलुई मट्टी के बनावल ठीहा पर चढ़ि के लाठी भांजल, नोनियाइल भीति के भहराइल कवनो अनहोनी ना कहाला। ई त सभे के पहिलही से मालूम रहेला कि का होखे वाला बा आ का होई। बाकि एह हहकारा से घोड़ा बेंच के सुतल लोगन के नीन खुलि जाये के चाही। सपना मे हमार आधा, हमार आधा के तिगड़म जोड़ले से हर घरी ना जुड़ पावे। खटिया के नीचे उतरे के परेला, चले –फिरे के परेला आ कुछ कामो करे के परेला, जवन लोगन के लउके।ढेर बिसवासो लोगन के शाइनिंग इंडिया के दरसन करा देवेला। दू –चार दिन मे हथोरी मे सरसों जमा के, ओकरा फूलत-फरत देखला के सोच “मुंगेरी लाल के सपना” से बेसी ना कहल जाई। सुने मे आवता कि एक जाने के कवनो तुरुप के ईक्का मिल गइल बाटे। एह घरी ओही के चमकावे मे जुटल बाड़े। कुछ लोग कहता कि सत्ताईस के तीन भाग मे बाटें के खेला होखी। मने सताइस के तीन भाग मे बाँटि के अगिला बेर लड़ाई मे उतरिहें। भगवान भला करे, इनहूँ के अंतरात्मा से कुछ आवाज निकलो।

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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